इक उम्र के...  

Posted by लोकेन्द्र in ,

इक उम्र के 
इक सफ़र में 
इक पड़ाव की 
आस थी!

बढ़ना होगा 
या भटक रहे 
अब इस 
प्रश्न की 
तलाश है!!

बचपन से सुना और पढ़ा है की रास्ते में हमेशा बाएं रहो.! लेकिन मजे की बात ये है की आज भोपाल के एम.पी.नगर में मै रोड के एकदम किनारे खड़ा था फिर भी एक सरदार अंकल अपने स्कूटर को मुझसे ठोक कर पूछे, "लगी तो नही.?" एक बार उनको देख कर मै अपना गुस्सा पी गया और वहाँ कोई तमाशा न बने इसलिए झट से उठ के कहा आप जाइये अंकल| खैर उस समय तो आभास नही हुआ लेकिन कुछ देर बाद जब बाएं हाथ की कुहनी में जलन महसूस हुई तो देखा खून बह रहा है और फिर जब मेडिकल स्टोर से दावा लेने बढ़ा तो पैर ठीक से नही रखा जा रहा था| खैर चोट ज्यादा नही लगी बस दाहिने हाथ की कुहनी बुरी तरह से रगड़ गई है, जिससे लिखते या पढ़ते समय हाथ को सहारा देने में तखलीफ़ है और बाएं पैर के मांसपेशियों में चोट है जिससे पैर ठीक से रखा नही जा रहा है| साथ ही फ्लैट पर पहुँचने पर पता चला की मेरी पैंट भी इसी में शहीद हो चुकी है|

वैसे जो होना था वो हो चुका है लेकिन मजे की बात ये है की अभी पिछले शुक्रवार को मेरे एक साथी ने मुझे रोड पार करते समय ये सलाह दी थी की भय्या सम्भल कर चलियेगा इस शहर में ट्रैफिक से खुद बचना होगा| उस समय भी मै हंसा था और अभी भी हंस रहा हूँ क्योकि आज मै एकदम बाएं खड़ा था और सरदार जी भी शायद बाएं चलो की नीति का अनुसरण करते हुए इतने बाएं होना चाहे की मुझी को मेरे बाएं से पीछाड़ना उचित समझा और मै अपनी बाएं तरफ से उनके चपेट में आ गया| खैर ईश्वर जो करता है वो अच्छे के लिए करता है, फिर भी मै भी अब इस बात का खुद अनुसरण करूँगा की इस शहर में बचना है तो खुद बचना है, नही तो आज बचे हैं कल का ईश्वर मालिक है...

यादों में ज़माना निकला...  

Posted by लोकेन्द्र in ,

हम रूठे, वो रूठे,
हम माने, वो माने,
हम ऐसे क्यूँ जाने 
हम भी थे दीवाने,
अब तो फ़साना निकला
यादों में ज़माना निकला|

कोई जब आया तो 
मिलकर हँसाया तो, 
करनी थी कुछ बातें 
करके उबाया तो,
अब भी फ़साना निकला 
यादों में ज़माना निकला 

आँखों की कहानी थी 
रूहों को सुनानी थी, 
कहते हैं कुछ अपने 
वो तो थे बस सपने, 
सपना इक देखा तो 
खोया या टूटा तो, 
अब भी फ़साना निकला 
यादों में ज़माना निकला|

जीवन की कहानी है 
अपनो की जुबानी है, 
करते थे जो संगी 
सबको सुनानी है, 
अब भी इक फ़साना निकला 
यादों में ज़माना निकला| 

राहों के साथी थे 
मंजिल दिखाते थे, 
भटके जो कोई भी
फटकार लगाते थे,
अब भी फ़साना निकला 
यादों में ज़माना निकला| 

हंसते तो, हंसते वो, 
रोया तो, रोया वो, 
खोया तो, खोये वो,
पाया तो, पाए वो,
रहता बस संग मै 
दुनिया घुमाये वो,
अब भी फ़साना निकला 
यादों में ज़माना निकला|

अब बस यादें हैं 
जो चले आते हैं, 
उन यादों की राहों में 
सब मिल जाते हैं,
अब भी फ़साना निकला 
यादों में ज़माना निकला|

अब समझ नही आता...  

Posted by लोकेन्द्र in ,

कुछ दिनों पहले की लिखी गई ये पंक्तियाँ बस एक आहत मन के भावनाओं को समाहित कर जैसी बनी वो अब आपके समक्ष प्रस्तुत है....


सुनहरी रातों में सपने भी सुनहरे थे,
हमको हर तरफ सब दिखते भी अपने थे|

खुद के अरमां थे, खुद का ही जूनून था,
दो कदम साथ बढे, सब हमसफ़र भी लगते थे|

चलना शुरू किया और किस किनारे पहुंचे थे,
हर मझधार में अब पतवार खोने से डरते थे|

फ़ासले थी दूरियों की, दिलो की गहराई में मिलते थे,
अब समझ नही आता, नासमझ थे या लोग हमें ठगते थे|


आज न्यूज चैनलो पर रेशमा जी के हिम्मत और त्याग भरे कर्म को देखकर हर भारतीयों की तरह मुझे भी गर्व हुआ.. अगर अफसोस हुआ तो सिर्फ अपने यहाँ चल रहे सरकारी तंत्र से की जहाँ ब्लास्ट के जाँच व उसे करने वाले के सुरक्षा के नाम पर करोड़ो और वोट के लिए अनुदान या सहायता राशि के नाम पर लाखों का खर्चा किया जाता है और जिसने अपने परिवार के ऊपर देश को तवज्जो दिया उसे सिर्फ और सिर्फ 25 हजार का नकद इनाम.. मै यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मै रुपये से किसी सम्मान को नही जोड़ रहा और न ही अपने जहन में इस बात की थोड़ी सी भी शंका रखता हूँ की इस हिम्मत भरे कदम को उठाने से पहले या बाद में उन्हे किसी प्रकार के इनाम की आशा रही होगी, उन्हे देश में सिर्फ शान्ति चाहिये थी जिसे अपने स्तर तक उन्होने सफल भी बनाया। उनके इस अमूल्य त्याग (अपने पति को ब्लास्ट करने के लिए बम रखने के आरोप में गिरफ्तार करा कर) की किसी भी ईनाम से तुलना किये बिना भी मुझे ये लगता है की वो जिस सम्मान की हकदार थी उन्हे वो नही मिला.. अफसोस है ये मुझे वोट के लिए देश को तोड़ने की राजनीति कर सत्ता का सुख भोगने वालों से..